रामनगर, 29 जुलाई। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कुमाउनी साहित्यकार स्व. मथुरादत्त मठपाल की 85वीं जयंती के अवसर पर आयोजित साहित्यिक समारोह में पिथौरागढ़ से प्रकाशित कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘आदलि कुशलि’ की संपादक डॉ. सरस्वती कोहली को पांचवें मथुरादत्त मठपाल स्मृति साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया। समारोह में उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके भविष्य पर भी गंभीर विमर्श किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जगदीश जोशी ने की, जबकि संचालन निखिलेश उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ शिक्षक डॉ. धर्मेंद्र नेगी एवं हरीश आर्य ‘हरीमन’ द्वारा स्व. मथुरादत्त मठपाल की कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति से हुआ।
‘दुदबोली’ के संपादक चारु तिवारी ने डॉ. सरस्वती कोहली के साहित्यिक योगदान एवं जीवन-वृत्त पर प्रकाश डाला। इसके उपरांत उन्हें शॉल ओढ़ाकर, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। वहीं ‘पहरू’ संस्था की ओर से भुवन पपनै को भी सम्मान प्रदान किया गया।
लोकभाषाओं के भविष्य पर आयोजित विचार-विमर्श में प्रो. प्रभा पंत, जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जहूर आलम, महासचिव मनोज सिंह, जगमोहन रौतेला, मदन चमोली, गजेंद्र बटोही, हयात सिंह रावत, नवेंदु मठपाल सहित अनेक साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि यदि कुमाउनी और गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को जीवित रखना है तो सबसे पहले उन्हें अपने घरों और दैनिक जीवन में बोलने की आदत विकसित करनी होगी।
इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी रखे गए। इनमें कुमाउनी एवं गढ़वाली भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने, लोकभाषाओं में साहित्य सृजन करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर साहित्यकारों के लिए सरकारी कोष स्थापित करने, लोकभाषाओं को विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्थान देने तथा आगामी जनगणना में भाषा संबंधी कॉलम में अपनी मातृभाषा कुमाउनी या गढ़वाली दर्ज कराने की अपील प्रमुख रही।
कार्यक्रम के दौरान हेमंत कुमार द्वारा संपादित कविता-संग्रह ‘हिमवंत : एक लोक साझी बज़्म’ का भी लोकार्पण किया गया।
समारोह में नंदिनी मठपाल, हिमांशु पांडे ‘मित्र’, सुमित कुमार, अशोक जोशी, नंदराम आर्य, सुमन जोशी, रितु बेलवाल, वंदना, एस.पी. मिश्रा, नवेंद्र जोशी, राजाराम विद्यार्थी, प्रकाश फुलोरिया, दिनेश रावत, पुष्पा मठपाल, वसंत वर्मा, जितेंद्र बिष्ट एवं देवेंद्र भट्ट सहित अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी और भाषा प्रेमी उपस्थित रहे।




