अगंलेख की पहाड़ी पर चमत्कारी शिवलिंग – आस्था और रहस्य का संगम
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में स्थित अगंलेख की पहाड़ी पर एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि एक रहस्यमयी कथा से भी जुड़ा हुआ है। यह स्थान है — श्री मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर, जिसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक मल्लिकार्जुन का अंश माना जाता है।
मल्लिकार्जुन महादेव: शिव और पार्वती की उपस्थिति
“मल्लिका” का अर्थ है मां पार्वती और “अर्जुन” का संकेत है भगवान शिव की ओर। इस नाम का सीधा संबंध शिव-पार्वती की दिव्य उपस्थिति से है। भारत में स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों में मल्लिकार्जुन का दूसरा स्थान है, और पिथौरागढ़ का यह मंदिर उसी पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
गाय और शिवलिंग की रहस्यमयी कथा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, 19वीं शताब्दी के मध्य में चमलेख क्षेत्र की कुछ गायें अगंलेख की पहाड़ी पर चरने जाया करती थीं। उनमें से एक दुधारू गाय प्रतिदिन एक विशेष स्थान पर जाकर स्वयं अपना दूध छोड़ देती थी। जब एक दिन एक ग्वाले ने इस दृश्य को देखा, तो वह स्तब्ध रह गया। उसने पाया कि वहां एक स्वयंभू शिवलिंग है, जिस पर वह गाय अपने आप दूध चढ़ा रही थी।
इस घटना की खबर जैसे ही आसपास के लोगों तक पहुंची, वहां श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा और मंदिर की स्थापना हुई। आज भी इस स्थान को एक दिव्य प्रकट स्थल माना जाता है।
सीमावर्ती आस्था का केंद्र
यह मंदिर केवल भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के श्रद्धालुओं का ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के लोगों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र है। वर्षभर यहाँ नेपाल से आने वाले श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, विशेषकर शिवरात्रि और सावन के पावन महीनों में यहाँ विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।
स्थान व पहुंच
- स्थान: अगंलेख की पहाड़ी, अस्कोट, पिथौरागढ़, उत्तराखंड
- दूरी: अस्कोट बाजार से लगभग 500 मीटर की दूरी पर
- पहाड़ी चढ़ाई: हल्की-फुल्की ट्रैकिंग, आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत मनमोहक
घूमने का सही समय
- मार्च से जून और सितंबर से नवंबर के बीच का मौसम यहाँ घूमने के लिए सबसे अनुकूल रहता है।
- सावन महीने और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।
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