मां उल्का देवी का डोला: पिथौरागढ़ की आस्था और परंपरा का जीवंत पर्व

सेरा गांव में मां उल्का देवी की डोला यात्रा: संस्कृति, श्रद्धा और दिव्यता का उत्सव

पिथौरागढ़ के सेरा गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाला मां उल्का देवी का डोला उत्सव न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जनमानस की गहरी आस्था का प्रतीक भी है।

धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत

इस वर्ष, दशमी के दिन सेरा गांव के खाल से मां उल्का देवी का डोला भक्तों के जयकारों और ढोल-नगाड़ों की मंगलध्वनि के बीच उठाया गया। इस पवित्र अवसर पर वातावरण भक्तिमय हो गया, जब देव डांगरों ने देवी का आह्वान कर अवतरित होने की परंपरा निभाई और श्रद्धालुओं को सुख, समृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान किया।

धुनी की परिक्रमा: आस्था की अग्नि में समर्पण

सेरा गांव में धुनी (अग्नि) के बीच देवतारी की रस्म पूरी की गई। पुजारी प्रेमानंद पुनेठा ने विधिपूर्वक पूजा संपन्न कराई। इस दौरान भूमिया देवता के डांगर कविंद्र मेहता ने आह्वान कर मां कालिका और मां भवानी के डांगरों को अवतरित कराया।

अशोक मेहता और कविंद्र मेहता, जो मां के देव डांगर हैं, उन्होंने देवत्व को धारण कर उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। डोला (मां की पालकी) ने दमाऊं, भौंकर और नगाड़ों की ताल पर धुनी की परिक्रमा की, जो श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावपूर्ण क्षण रहा।

डोला यात्रा और जनभागीदारी

धुनी की परिक्रमा के उपरांत डोला सेरा गांव से मां उल्का देवी मंदिर के लिए रवाना हुआ। इस यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। यह आयोजन जन आस्था का उत्सव बन गया, जिसमें गांव और क्षेत्र के गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे:

संस्कृति और आस्था का संगम

मां उल्का देवी का डोला उत्सव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह पिथौरागढ़ की लोक परंपराओं, सामूहिकता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रमाण है। इसमें लोक देवताओं की उपस्थिति, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और सामूहिक भक्ति की भावना मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो हर श्रद्धालु के हृदय को स्पर्श करता है।

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